The Rise of Nationalism In Europe Hindi Notes | यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय | हिंदी नोट्स Part 4

Class 10th History Chapter 1 Hindi Notes

यूरोप में राष्टवाद का उदय

Class 10 History

हिंदी नोट्स


ग्रीस की आजादी: ग्रीस की आजादी की लड़ाई ने पूरे यूरोप के पढ़े लिखे वर्ग में राष्ट्रवाद की भावना को और मजबूत कर दिया। ग्रीस की आजादी का संघर्ष 1821 में शुरु हुआ था। ग्रीस के राष्ट्रवादियों को ग्रीस के ऐसे लोगों से भारी समर्थन मिला जिन्हे देशनिकाला दे दिया गया था। इसके अलावा उन्हें पश्चिमी यूरोप के अधिकाँश लोगों से भी समर्थन मिला जो प्राचीन ग्रीक संस्कृति का सम्मान करते थे। मुस्लिम साम्राज्य के विरोध करने वाले इस संघर्ष का समर्थन बढ़ाने के लिए कवियों और कलाकारों ने भी जन भावना को इसके पक्ष में लाने की भरपूर कोशिश की। यहाँ पर यह बताना जरूरी है कि ग्रीस उस समय ऑटोमन साम्राज्य का एक हिस्सा हुआ करता था। आखिरकार 1832 में कॉन्स्टैंटिनोपल की ट्रीटी के अनुसार ग्रीस को एक स्वतंत्र देश की मान्यता दे दी गई।

राष्ट्रवादी भावना और रोमाँचक परिकल्पना: रोमांटिसिज्म एक सांस्कृतिक आंदोलन था जिसने राष्ट्रवादी भावना के एक खास स्वरूप को विकसित करने की कोशिश की थी। रोमांटिक कलाकार अक्सर विज्ञान और तर्क के बढ़ावे की आलोचना करते थे। उनका फोकस भावुकता, सहज ज्ञान और रहस्यों पर ज्यादा होता था। उन्होंने एक साझा विरासत, एक साझा सांस्कृतिक इतिहास, को राष्ट्र के आधार के रूप में बनाने की कोशिश की थी।

कई अन्य रोमांटिक ने; जैसे कि जर्मनी के तर्कशास्त्री जोहान गॉटफ्रिड हर्डर (1744 – 1803); का मानना था कि जर्मन संस्कृति के सही स्वरूप को वहाँ के आम लोगों में ढ़ूँढ़ा जा सकता था। इन रोमांटिक विचारकों ने देश की सच्ची भावना को लोकप्रिय बनाने के लिए लोक गीत, लोक कविता और लोक नृत्य का सहारा लिया। ऐसी स्थिति में जब अधिकाँश लोग निरक्षर थे तब आम लोगों की भाषा का इस्तेमाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता था। कैरोल करपिंस्की ने पोलैंड में अपने ओपेरा के माध्यम से राष्ट्रवाद के संघर्ष को और उजागर किया था। उन्होंने वहाँ के लोक नृत्यों; जैसे कि पोलोनैज और माजुर्का; को राष्ट्रीय प्रतीक में बदल दिया था।

राष्ट्रवादी भावना को बढ़ावा देने में भाषा ने भी अहम भूमिका निभाई थी। रूस द्वारा सत्ता हड़पने के बाद पोलैंड के स्कूलों से पॉलिस भाषा को हटा दिया गया और हर जगह रूसी भाषा को थोपा जाने लगा। रूसी शासन के खिलाफ 1831 में एक हथियारबंद विद्रोह भी शुरु हुआ था लेकिन उस आंदोलन को कुचल दिया गया। लेकिन इसके बाद पादरी वर्ग के सदस्यों ने पॉलिस भाषा का इस्तेमाल राष्ट्रीय विरोध के शस्त्र के रुप में करना शुरु किया। चर्च के सभी अनुष्ठानों और अन्य धार्मिक गतिविधियों में पॉलिस भाषा का ही इस्तेमाल होता था। रूसी भाषा में प्रवचन देने की मनाही करने पर रूसी अधिकारियों ने कई पादरियों को जेल भेज दिया या फिर साइबेरिया भेज दिया। इस प्रकार से पॉलिस भाषा का इस्तेमाल रूसी प्रभुत्व के खिलाफ विरोध का प्रतीक बन गया।

भूखमरी, कठिनाइयाँ और लोगों का विरोध: 1830 का दशक यूरोप के लिए आर्थिक तंगी का दशक था। उन्नीसवीं सदी के शुरु के आधे वर्षों में जनसंख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई थी। बेरोजगारों की संख्या में कई गुणा इजाफा हुआ था। ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की तरफ बड़ी संख्या में पलायन हुआ था। आप्रवासी लोग शहरों में ऐसी झुग्गी झोपड़ियों में रहते थे जहाँ पर बहुत भीड़-भाड़ होती थी। उस काल में यूरोप के अन्य भागों की तुलना में इंग्लैंड में औद्योगिकीकरण ज्यादा तेजी से हुआ था। इसलिए इंग्लैंड की मिलों में बनने वाले सस्ते सामानों से यूरोप के अन्य देशों में छोटे उत्पादकों द्वारा बनाए जाने वाले सामानों को कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही थी। यूरोप के कुछ क्षेत्रों में अभी भी अभिजात वर्ग का नियंत्रण था और इसके कारण किसानों पर सामंतों के लगान का भारी बोझ था। एक साल के फसल के नुकसान और खाद्यान्नों की बढ़्ती हुई कीमतों के कारण कई गाँवों और शहरों में भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।

1848 का साल ऐसा ही एक बुरा साल था। भोजन की कमी और बढ़ती बेरोजगारी के कारण पेरिस के लोग सड़कों पर उतर आए थे। विद्रोह इतना जबरदस्त था कि लुई फिलिप को वहाँ से पलायन करना पड़ा। एक नेशनल एसेंबली ने प्रजातंत्र की घोषणा कर दी। 21 साल से ऊपर की उम्र के सभी वयस्क पुरुषों को मताधिकार दे दिया गया। लोगों को काम के अधिकार की घोषणा भी की गई। रोजगार मुहैया कराने के लिए राष्ट्रीय कार्यशाला बनाई गई।

उदारवादियों की क्रांति: जब गरीबों का विद्रोह 1848 में हो रहा था, तभी एक अन्य क्रांति भी शुरु हो चुकी थी जिसका नेतृत्व पढ़ा लिखा मध्यम वर्ग कर रहा था। यूरोप के कुछ भागों में स्वाधीन राष्ट्र जैसी कोई चीज नहीं थी; जैसे कि जर्मनी, इटली, पोलैंड और ऑस्ट्रो-हंगैरियन साम्राज्य में। इन क्षेत्रों के मध्यम वर्ग के स्त्री और पुरुषों ने राष्ट्रीय एकीकरण और संविधान की मांग शुरु कर दी। उनकी मांग थी कि संसदीय प्रणाली पर आधारित राष्ट्र का निर्माण हो। वे एक संविधान, प्रेस की आजादी और गुटबंदी की आजादी चाहते थे।

फ्रैंकफर्ट पार्लियामेंट: जर्मनी में ऐसे कई राजनैतिक गठबंधन थे जिनके सदस्य मध्यम वर्गीय पेशेवर, व्यापारी और धनी कलाकार हुआ करते थे। वे फ्रैंकफर्ट शहर में एकत्रित हुए और एक सकल जर्मन एसेंबली के लिए वोट करने का फैसला किया। 18 मई 1848 को 831 चुने हुए प्रतिनिधियों ने जश्न मनाते हुए एक जुलूस निकाला और फ्रैंकफर्ट पार्लियामेंट को चल पड़े जिसका आयोजन सेंट पॉल के चर्च में किया गया था। उन्होंने एक जर्मन राष्ट्र का संविधान तैयार किया। उस राष्ट्र की कमान कोई राजपरिवार का आदमी करता जो पार्लियामेंट को जवाब देने के लिए उत्तरदायी होता। इन शर्तों पर प्रसिया के राजा फ्रेडरिक विलहेम (चतुर्थ) को वहाँ का शासन सौंपने की पेशकश की गई। लेकिन उसने इस अनुरोध को ठुकरा दिया और उस चुनी हुई संसद का विरोध करने के लिए अन्य राजाओं से हाथ मिला लिया।

अभिजात वर्ग और सेना द्वारा पार्लियामेंट का विरोध बढ़ता ही गया। इस बीच पार्लियामेंट का सामाजिक आधार कमजोर पड़ने लगा क्योंकि उसमें मध्यम वर्ग का दबदबा था। मध्यम वर्ग मजदूरों और कारीगरों की माँग का विरोध करता था और इसलिए उसे उनके समर्थन से हाथ धोना पड़ा। आखिरकार सेना बुलाई गई और इस तरह से एसेंबली को समाप्त कर दिया गया।

उदारवादी आंदोलन में महिलाओं ने भी भारी संख्या में हिस्सा लिया। इसके बावजूद, एसेंबली के चुनाव में उन्हें मताधिकार से मरहूम किया गया। जब सेंट पॉल के चर्च में फ्रैंकफर्ट पार्लियामेंट बुलाई गई तो महिलाओं को केवल दर्शक दीर्घा में बैठने की अनुमति मिली।

हालाँकि रुढ़िवादी ताकतों द्वारा उदारवादी आंदोलन को कुचल दिया गया लेकिन पुरानी व्यवस्था को दोबारा बहाल नहीं किया जा सका। 1848 के कई वर्षों के बाद राजा को यह अहसास होने लगा कि आंदोलन और दमन के उस कुचक्र को समाप्त करने का अगर कोई तरीका था तो वह था राष्ट्रवादी आंदोलनकारियों की मांगों को मान लेना। इसलिए मध्य और पूर्वी यूरोप के राजाओं ने उन बदलावों को अपनाना शुरु कर दिया जो पश्चिमी यूरोप में 1815 से पहले ही हो चुके थे।

हैब्सबर्ग के उपनिवेशों और रूस में दास प्रथा और बंधुआ मजदूरी को समाप्त किया गया। 1867 में हैब्सबर्ग के शासकों ने हंगरी को अधिक स्वायत्तता प्रदान की।

जर्मनी: क्या सेना किसी राष्ट्र का निर्माण कर सकती है?

1848 के बाद यूरोप में राष्ट्रवाद प्रजातंत्र और क्रांति से दूर हो चुका था। रुढ़िवादी ताकतें राष्ट्रवाद की भावना को इसलिए हवा देने लगे थे ताकि शासक की शक्ति बढ़ाई जा सके और यूरोप में राजनैतिक प्रभुता हासिल की जा सके।

पहले आपने देखा कि किस तरह से राजा और सेना की मिली जुली ताकतों ने जर्मनी में मध्यम वर्ग के आंदोलन को कुचल दिया था। प्रसिया के बड़े भूस्वामी (जिन्हें जंकर कहा जाता था) भी उन दमनकारी नीतियों का समर्थन करते थे। उसके बाद प्रसिया ने राष्ट्रीय एकीकरण के आंदोलन की कमान संभाल ली।

ओटो वॉन बिस्मार्क: ये प्रसिया के मुख्य मंत्री थे जिन्होंने जर्मनी के एकीकरण की बुनियाद रखी थी। इस काम में बिस्मार्क ने प्रसिया की सेना और प्रशासन तंत्र का सहारा लिया था। सात सालों में तीन युद्ध हुए; ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस के खिलाफ्। प्रसिया की जीत के साथ युद्ध समाप्त हुए और इस तरह से जर्मनी एकीकरण का काम पूरा हुआ। प्रसिया के राजा विलियम प्रथम को जर्मन का बादशाह घोषित किया गया। इसके लिए वार्सा में 1871 की जनवरी में एक समारोह का आयोजन हुआ था।

नए राष्ट्र ने जर्मनी में मुद्रा, बैंकिंग, और न्याय व्यवस्था के आधुनिकीकरण पर खास ध्यान दिया। अधिकतर मामलों में प्रसिया के कायदे कानून ही जर्मनी के लिए आदर्श का काम करते थे।

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