KINGS, FARMERS AND TOWNS {Early States and Economics} | राजा, किसान और नगर {आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ} | Chapter 2 Class 12 History

KINGS, FARMERS AND TOWNS {Early States and Economics} | राजा, किसान और नगर {आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ} | Chapter 2 Class 12 History

प्रश्न 1. आरंभिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पावन के प्रमाणों की चर्चा कीजिए। हड़प्पा के नगरों के प्रमाण से ये प्रमाण कितने भिन्न हैं?
Discuss the evidence for craft production in early historic cities. In what ways in this different from the evidence from Harappan cities. 

उत्तर : हड्प्पा के नगरों की व्यापक खुदाइयाँ हुई हैं इन्हीं जूदाइयों से हड़प्पा सभ्यता के शिल्पकला उत्पादनों के प्रमाण मिले हैं। इसके विपरीत आरंभिक ऐतिहासिक नगरों की व्यापक दाई संभव नहीं है, क्योंकि इन क्षेत्रों में आज भी लोग रहते हैं। फिर भी यहाँ से विभिन्न प्रकार के पुरावशेष प्राप्त हुए हैं इन नगरों में शिल्प उत्पादन के कुछ अन्य प्रमाण अभिलेखों से मिले हैं।
आरंभिक नगरों में शिल्पकला उत्पादन- (i) इन स्थलों से उत्कृष्ट श्रेणी के मिट्टी के कटोरे तथा थालियाँ मिली हैं जिन पर चमकदार कलई चढ़ी है। इन्हें उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र N.B.P.W.) कहा जाता है। इनका प्रयोग संभवतः धनी लोग करते होने।
(ii) यहाँ से सोने, चाँदी, हाथी दाँत, ताँबे तथा शीशे के बने गहनों, उपकरणों, हथियारों, पक्की मिट्टी, सीप आदि के प्रमाण भी मिले हैं।
(iii) दानात्मक अभिलेखों से पता चलता है कि इन नगरों में धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, सुनार, लोहार आदि शिल्पकार रहते थे। लोहार लोहे का सामान बनाते थे। नगरों से लोहे के प्रयोग के प्रमाण नहीं मिले हैं।
(iv)  हड़प्पा के उत्पादकों तथा व्यापारियों ने अपने संघ बनाए हुए थे जिन्हें श्रेणी कहा जाता था। ये श्रेणियाँ कच्चा माल खरीदकर सामान तैयार करती थीं और उसे बाजार में बेचती थीं।

प्रश्न 2. महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए। 
Describe the salient features of Mahajanapadas. 

उत्तर : बौद्ध तथा जैन धर्म के आरंभिक ग्रंथों में महाजनपद के नाम से 16 राज्यों का उल्लेख मिलता है। यद्यपि महाजनपदों के नाम इन ग्रंथों में एक समान नहीं हैं, तो भी वज्जि, मगध, कौशल, कुरु, पांचाल, गांधार तथा अवंति आदि नाम एक जैसे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि ये महाजनपद सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण रहे होंगे।
विशिष्ट अभिलक्षण-महाजनपदों के कुछ विशिष्ट अभिलक्षण निम्नलिखित थे
(i) अधिकांश महाजनपदों पर एक राजा का शासन होता था परंतु गण और संघ के नाम से विख्यात राज्यों पर कई लोगों का समूह शासन करता था। इस समूह का प्रत्येक व्यक्ति राजा कहलाता था। भगवान् महावीर और भगवान् बुद्ध इन्हीं गणों से संबंधित थे। वज्जि संघ की भाँति कुछ राज्यों में भूमि सहित अनेक आर्थिक स्रोतों पर राजा लोगों का सामूहिक नियंत्रण होता था।
(ii) प्रत्येक महाजनपद की एक राजधानी होती थी जो प्रायः किले से घिरी होती थी। किलेबंद राजधानियों के रख-रखाव, प्रारंभी सेनाओं और नौकरशाही के लिए भारी आर्थिक साधनों की आवश्यकता होती थी।
प्रश्न 3. सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण इतिहासकार कैसे करते हैं ?
How do historians reconstruct the lives of ordinary people.

उत्तर : सामान्य लोगों ने अपने जीवन की लिखित जानकारी विरले ही छोड़ी। इसलिए उनके जीवन का पुनर्निर्माण करने के लिए विभिन्न प्रकार के स्रोतों का सहारा लेना पड़ता है। इनमें से कुछ स्रोत निम्नलिखित हैं

(i)  खुदाइयों में विभिन्न प्रकार के अनाजों के दाने तथा जानवरों की हड्डियाँ मिली हैं। इनसे लोगों के भोजन की जानकारी मिलती है।
(ii) भवनों तथा पात्रों के अवशेषों से उनके घरेलू जीवन का पता लगाया जाता है। (ii) अभिलेखों में विभिन्न प्रकार के शिल्पों तथा शिल्पकारों का उल्लेख मिलता है। इनसे साधारण लोगों के आर्थिक जीवन की झाँकी मिलती है।
(iv) कुछ अभिलेखों तथा पांडुलिपियों में राजा-प्रजा संबंधी, जैसे-विभिन्न प्रकार के करों से अनुमान लगाया जाता है कि सामान्य लोग सुखी थे अथवा दुःखी।
(v) बदलते कृषि-यंत्र तथा अन्य उपकरण साधारण लोगों के बदलते जीवन पर प्रकाश डालते हैं। उदाहरण के लिए लोहे के प्रयोग से अनुमान लगाया जा सकता है कि कृषि करना आसान हो गया होगा और उत्पादन बढ़ गया होगा। इससे सामान्य कृषक समृद्ध बने होंगे।
(vi) व्यापार संघों से उत्पादकों के हितों की रक्षा का संकेत मिलता है।
(vii) इतिहासकार प्रचलित लोककथाओं से भी सामान्य लोगों के जीवन की जानकारी प्राप्त करते हैं।

प्रश्न 4. पाड्य सरदार को दी जाने वाली वस्तुओं की तुलना दंगुन गाँव की वस्तुओं से कीजिए। आपको क्या समानताएँ और असमानताएँ दिखाई देती हैं?
Compare and contrast the list of things given to the Pandyan Chief with those produced in the village of Danguna. Do you notice any similarities or differences ?

उत्तर : पांड्य सरदार को दी जाने वाली वस्तुओं में हाथी दाँत, सुगंधित लकड़ी, हिरणों के बालों से बने चंवर, मधु-चदन, गेहूँ, सुरमा, हल्दी, इलायची आदि कई वस्तुएँ शामिल हैं। इनके अतिरिक्त नारियल, आम, जड़ी-बूटी, फूल, प्याज, गन्ना, फूल, सुपारी, केला तथा कई पशु-पक्षी भी उपहार में दिए गए। इसके विपरीत दंगल गाँव की वस्तुओं में घास, जानवरों की खाल, कोयला, नमक तथा अन्य खनिज पदार्थों, मदिरा, खादिर वृक्ष के उत्पादन, फूल, दूध आदि शामिल हैं।
समानता : फूलों को छोड़कर इन दोनों सूचियों में कोई विशेष समानता नहीं जान पड़ती। यह संभव है दंगुन गाँव की भाँति पांड्य सरदार भी उपहार में मिलने वाले जानवरों की खाल का प्रयोग करता हो।
असमानता : इन वस्तुओं की एक लंबी सूची में असमानता दिखाई देती है। सबसे बड़ी असमानता तो इन वस्तुओं की प्राप्ति के तरीके में है। पांड्य सरदार को लोग खुशी-खुशी और नाच-गाकर वस्तुएँ उपहार में देते थे। इसके विपरीत भूमि दान से पहले दंगुन गाँव के निवासियों को अपने यहाँ की वस्तुएँ राज्य तथा उसके अधिकारियों को देनी पड़ती थी, क्योंकि यह उनका कर्तव्य था।

प्रश्न 5. अभिलेखशास्त्रियों की कुछ समस्याओं का उल्लेख कीजिए।
List some of the problems faced by epigraphists.
उत्तर : अभिलेखशास्त्री अभिलेखों का अध्ययन करने वाले विद्वान होते हैं। इनकी कुछ मुख्य समस्याएँ निम्नलिखित हैं.
(i) कभी-कभी अक्षरों को बहुत हल्के ढंग से उत्कीर्ण किया जाता है जिन्हें पढ़ना कठिन होता है।
(ii) अभिलेख नष्ट भी हो सकते हैं जिससे अक्षर लुप्त हो जाते हैं।
(iii) अभिलेखों के शब्दों के वास्तविक अर्थ के बारे में पूर्ण रूप से ज्ञान हो पाना भी सदैव सरल नहीं होता क्योंकि कुछ अर्थ किसी विशेष स्थान या समय से संबंधित होते हैं।
(iv) अभिलेख हजारों की संख्या में प्राप्त हुए हैं, परंतु सभी के न तो अर्थ निकाले जा सके हैं और न ही उनके अनुवाद किए गए हैं।
(v) अनेक अभिलेख और भी रहे होंगे जिनका अस्तित्व ही मिट गया है। इसलिए जो अभिलेख अभी उपलब्ध हैं, वे संभवत: कुल अभिलेखों का केवल एक अंश है।
(vi) इस संबंध में एक और मौलिक समस्या भी है। वह यह है कि जिस चीज को हम आज राजनीतिक तथा आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण मानते हैं वह सब कुछ अभिलेखों में अंकित नहीं है। उदाहरण के लिए, खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और दैनिक जीवन के सुख-दुःख का उल्लेख अभिलेखों में नहीं मिलता, क्योंकि अभिलेख प्रायः बड़े और विशेष अवसरों का ही वर्णन करते हैं।
(vii) अभिलेख सदा उन्हीं व्यक्तियों के विचार व्यक्त करते हैं जो उन्हें बनवाते थे। इसलिए वास्तविकता जानने के लिए इन अभिलेखों का आलोचनात्मक अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 6. मौर्य प्रशासन के अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए | असोक के अभिलेखों में इनमें से कौन-कौन से तत्वों के प्रमाण मिलते हैं ?
Discuss the main features of Mauryan administration. Which of these elements are evident in the Asokan inscriptions that you have studied ?

उत्तर : मौर्य प्रशासन के लगभग सभी प्रमुख अभिलक्षणों की जानकारी असोक के अभिलेखों से मिलती है- जैसे राजा-प्रजा संबंध, राजनीतिक केंद्र, प्रमुख अधिकारी तथा उनके कर्तव्य इत्यादि। अभिलेखों में आधुनिक पाकिस्तान के पश्चिमोत्तार सीमांत से लेकर आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक हर स्थान पर एक जैसे संदेश उत्कीर्ण किए गए थे। मौर्य साम्राज्य के इन तथा कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण अभिलक्षणों का वर्णन इस प्रकार है-

(i) पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र : मौर्य साम्राज्य का सबसे बड़ा केंद्र मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र था। इसके अतिरिक्त असोक के अभिलेखों में साम्राज्य के चार प्रांतीय केंद्रों का उल्लेख भी मिलता है। ये केंद्र थे-तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि (तोशाली) तथा सुवर्णगिरि।
(ii) असमान शासन-व्यवस्था : मौर्य साम्राज्य बहुत ही विशाल था। इसके अतिरिक्त साम्राज्य में शामिल क्षेत्र बडे विविध और भिन्न-भिन्न प्रकार के थे-कहाँ अफगानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र और कहाँ उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र। इतने विशाल तथा विविधता भरे साम्राज्य का प्रशासन एक समान होना संभव नहीं था। परंतु यह संभव है कि सबसे कड़ा प्रशासनिक नियंत्रण साम्राज्य की राजधानी तथा उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो।
(iii) प्रांतीय केंद्रों का चयन : प्रांतीय केंद्रों का चयन बड़े- ध्यान से किया गया था। तक्षशिला तथा उज्जयिनी दोनों लंबी दूरी वाले महत्त्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर स्थित थे। कर्नाटक में सुवर्णगिरि (अर्थात् सोने के पहाड़) सोने की खदान के कारण महत्त्वपूर्ण था।
(iv) आवागमन को सुचारु बनाना : साम्राज्य के संचालन के लिए स्थल और जल दोनों मार्गों से आवागमन का सुचारु बना रहना अत्यंत आवश्यक था। राजधानी से प्रांतों तक जाने में कई सप्ताह या महीने लग जाते थे। ऐसे में यात्रियों के लिए खान-पान और उनकी सुरक्षा की व्यवस्था करनी पड़ती होगी। ऐसा प्रतीत होता है कि सेना सुरक्षा का प्रमुख माध्यम रही होगी।
(v) समिति तथा उप-समितियाँ : मेगस्थनीज ने सैनिक गतिविधियों के संचालन के लिए एक समिति तथा छः उपसमितियों का उल्लेख किया है
  • इनमें से एक उपसमिति का काम नौसेना का संचालन करना था।
  • दूसरी यातायात और खान-पान का संचालन करती थी।
  • तीसरी का काम पैदल सैनिकों का संचालन करना था।
  • चौथी का अश्वारोहियों, पाँचवीं का रथारोहियों तथा छठि का काम हाथियों का संचालन करना था। दूसरी उपसमिति के जिम्मे कई काम थे; जैसे उपकरणों के ढोने के लिए बैलगाड़ियों की व्यवस्था करना, सैनिकों के लिए भोजन तथा जानवरों के लिए चारे का प्रबंध करना और सैनिकों की देखभाल के लिए सेवकों तथा शिल्पकारों की नियुक्ति करना।
(vi) धम्म महामात्रों की नियुक्ति : असोक ने अपने ন साम्राज्य को संगठित बनाए रखने का प्रयास किया। ऐसा उन्होंने धम्म के प्रचार द्वारा भी किया। धम्म के सिद्धांत बहुत ही साधारण तथा सार्वभौमिक थे। असोक का मानना था कि धम्म का पालन ३ करके लोगों का जीवन इस संसार में और इसके बाद के संसार में अच्छा रहेगा। अतः धम्म के प्रचार के लिए धम्म महामात्र द्रो नामक विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की गई। इस बात का उल्लेख भी अभिलेखों में मिलता है।

प्रश्न 7. यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेख शास्त्री डी. सी. सरकार का वक्तव्य है "भारतीयों के : जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है, जिनका प्रतिबिंब अभिलेखों में नहीं है।" चर्चा कीजिए।
This is a statement made by one of the best-known epigraphists of the twentieth century, D.C. Sircar: "There no aspect of life, culture and activities of the Indians T that is not reflected in inscriptions". Discuss.

उत्तर : सुविख्यात अभिलेख शास्त्री डी० सी० सरकार ने सत्य ही कहा है कि अभिलेखों में भारतीयों के जीवन के प्रत्येक पक्ष की झाँकी प्रस्तुत की गई है। इस संबंध में कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं
1. राज्य-विस्तार का निर्धारण : अभिलेखों से हमें किसी राजा के राज्य-विस्तार का पता चलता है। प्राचीन राजा स्तंभ केवल अपने राज्य की सीमा के भीतर ही स्थापित करवाते थे। अत: जिन स्थानों पर जिस राजा के अभिलेख मिले हैं, वे उस राजा के राज्य का ही भाग माने जा सकते हैं।
2. राजाओं के नाम : अभिलेखों से हमें अनेक राजाओं के नामों का पता चलता है। इन नामों का पहले किसी अन्य स्रोत से पता न चल सका था। असोक के लिए 'देवनाम् प्रिय:' तथा 'प्रियदर्शी' (पियदस्सी) आदि नाम भी प्रयोग किए गए, ऐस अशोक के अभिलेखों से ही पता चलता है।
3. ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी : अभिलेखों से हमें अनेक ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी प्राप्त होती है। समुद्रगुप्त के जीवन की सभी घटनाएँ इलाहाबाद प्रशस्ति से जानी जा सकती हैं। असोक के शिलालेखों से कलिंग युद्ध तथा उसके भीषण परिणामों का पता चलता है। इसी प्रकार चंद्रगुप्त विक्रमादित्य, राजा भोज, पुलकेशिन द्वितीय आदि अनेक राजाओं के जीवन के उतार-चढ़ाव अभिलेखों के कारण ही प्रकाश में आए हैं।
4. राजाओं के चरित्र की जानकारी : अभिलेख संबंधित राजाओं के चरित्र की झाँकी भी प्रस्तुत करते हैं। असोक का प्रजापालक होने की प्रमाण उसके अभिलेखों से ही मिलता है। अभिलेख उसे दयावान, पशु-रक्षक तथा परिवार-प्रेमी भी सिद्ध करते हैं। इलाहाबाद प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को महान योद्धा तथा विद्वान बताया गया है।
5. व्यवस्था और प्रशासन की जानकारी : कुछ भू- राजाओं और सामंतों द्वारा किए गए भूमिदान के अभिलेख विशेष महत्त्व के हैं। इनसे प्राचीन भारत की भू-व्यवस्था और प्रशासन के बारे में उपयोगी सूचनाएँ मिलती हैं। ये अभिलेख अधिकतर ताम्र-पत्रों पर लिखे गए हैं जो प्राचीनकाल की सभी भाषाओं में लिखे मिलते हैं। इसमें भिक्षुओं, ब्राह्मणों, मंदिरों, विहारों, जागीरदारों, अधिकारियों आदि को दिए गए गाँवों, भूमियों तथा राजस्व स्रोतों का विवरण मिलता है।
6. काल निर्धारण : अभिलेख ऐतिहासिक तिथियाँ तथा युद्ध काल को निर्धारित करने में बड़ा योगदान देते हैं। काल का पता अभिलेखों की लिपि और लिखने के ढंग से चल जाता है ।
7. साहित्यिक स्तर की जानकारी : अभिलेख की भाषा से उसे काल के साहित्यिक स्तर का पता चलता है। हमें यह भी पता चलता है कि देश के किस-किस भाग में संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल, तेलगू आदि भाषाएँ प्रचलित थीं और उनका क्या स्तर था।
8. भाषाओं तथा धर्म संबंधी जानकारी : अभिलेखों की भाषा हमें तत्कालीन धर्म की जानकारी कराती है। प्राचीनकाल में संस्कृत भाषा हिंदू धर्म की प्रतीक समझी जाती थी। इसी प्रकार प्राकृत भाषा बौद्ध धर्म से बँधी हुई थी।
9. कला प्रियता की जानकारी : अभिलेख, शिलाओं तथा गुफाओं को तराश-सँवार कर खोदे गए हैं। इनसे तत्कालीन कलाप्रियता का परिचय मिलता है। असोक के अभिलेख मौर्य कला के उत्कृष्ट नमूने हैं।
10. सामाजिक वर्गों की जानकारी : अभिलेख हमें तत्कालीन सामाजिक वर्गों की जानकारी देते हैं। हमें पता चलता है, उस समय शासक वर्ग के अतिरिक्त बुनकर, सुनार, धोबी, लौहकार, व्यापारी, कृषक आदि कई वर्ग थे। सच तो यह है कि अभिलेख भारतीय जीवन तथा संस्कृति के दर्पण हैं।

प्रश्न 8. उत्तर-मौर्य काल में विकसित राजत्व के विचारों की चर्चा कीजिए।
Discuss the notions of kingship that developed in the past Mauryan period.

उत्तर : उत्तर मौर्यकाल में राजत्व के जिन विचारों का विकास हुआ उनकी प्रमुख विशेषता थी-राजा का दैविक स्वरूप। राजा उच्च स्थिति प्राप्त करने के लिए स्वयं को देवी-देवताओं के साथ जोड़ने लगे। मध्य एशिया से लेकर पश्चिमोत्तर भारत तक शासन करने वाले कुषाण शासकों ने (लगभग प्रथम शताब्दी ई०पू० से प्रथम शताब्दी ई० तक) इस तरीके का भरपूर प्रयोग किया। कुषाण इतिहास की रचना अभिलेखों तथा साहित्य परंपरा के माध्यम से की गई है। जिस प्रकार के राजधर्म (राजत्व) को कुषाण शासकों ने प्रस्तुत करने का प्रयास किया, उसका सर्वोत्तम प्रमाण उनके सिक्कों और मूर्तियों से प्राप्त होता है।


I. कुषाण शासक : (i) उत्तर प्रदेश में मथुरा के पास स्थित माट के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ मिली हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इन मूर्तियों के माध्यम से कुषाण स्वयं को देव-तुल्य प्रस्तुत करना चाहते थे। कई कुषाण शासकों ने अपने नाम के आगे 'देवपुत्र' की उपाधि भी लगाई थी। वे संभवत: उन चीनी शासकों से प्रेरित हुए होंगे, जो स्वयं को 'स्वर्गपुत्र' कहते थे।
(ii) कुषाण शासकों के सिक्कों पर भी एक राजा की भव्य प्रतिमा दिखाई गई है। सिक्के के दूसरी ओर एक देवता का चित्र है। ऐसे सिक्के भी कुषाणों को देव-तुल्य दर्शाने के लिए जारी किए गए थे।

II. गुप्त शासक : (i) राजत्व के विचारों में दूसरा विकास गुप्तकाल में हुआ। चौथी शताब्दी ई० में गुप्त साम्राज्य सहित कई बड़े साम्राज्यों के साक्ष्य मिलते हैं। इनमें से कई साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे। ये समाज अपना निर्वाह स्थानीय संसाधनों द्वारा करते थे जिसमें भूमि पर नियंत्रण भी शामिल था। सामंत अपने शासकों का सम्मान करते थे और आवश्यकता के समय सैनिक सहायता भी देते थे। कुछ शक्तिशाली सामंत राजा भी बन जाते थे और राजा यदि दुर्बल होते थे तो वे अपने से अधिक शक्तिशाली शासकों के अधीन हो जाते थे।
(ii) गुप्त शासकों के इतिहास के निर्माण में साहित्य, सिक्कों और अभिलेखों की सहायता ली गयी है। साथ ही कवियों द्वारा अपने राजा या स्वामी की प्रशंसा में लिखी गई प्रशस्तियों का सहारा भी लिया गया है। इतिहासकार इन प्रशस्तियों के आधार पर ऐतिहासिक तथ्य निकालने का प्रयास करते हैं परंतु इनमें राजाओं की बढ़-चढ़कर प्रशंसा की गई है जिससे ऐतिहासिक तथ्य दबकर रह गए हैं। उदाहरण के लिए इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख के नाम से प्रसिद्ध प्रयोग प्रशस्ति को ही लीजिए। इसके लेखक हरिषेण ने समुद्रगुप्त को बहुत ही शक्तिशाली सम्राट बताया है। वह तो यहाँ तक लिखता है; धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वीवी नहीं था। अनेक गुणों शुभकार्यों से संपन्न उन्होंने अपने पैर के तलवे से अन्य राजाला के यश को मिटा दिया था। वे परमात्मा पुरुष है। ऐसी प्रशंसा के पीछे राजस्व के नए विचार ही झलकते हैं। 

प्रश्न 9. वर्णित काल में कृषि के तौर-तरीकों में किया ? हद तक परिवर्तन हुए

अथवा
छठी शताब्दी ई० पू० से छठी शताब्दी ई० तक कृषि उत्पादन वृद्धि के लिए प्रयुक्त किन्हीं दो तरीकों का वर्णन कीजिए। To what extent were agricultural practices transformed in the period under consideration ? 

उत्तर : 600 ई० पू० से 600 ई० के दौरान राजाओं द्वारा करें की मांग बढ़ने लगी थी। करों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए किसान उपज बढ़ाने के लिए उपाय ढूँढने लगे। फलस्वरू कृषि के तौर-तरीकों में परिवर्तन आने लगे।
1. हल का प्रचलन : उपज बढ़ाने का एक तरीका हल के प्रचलन था। हल का प्रयोग छठी शताब्दी ई० पू० से ही गंगा औ कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्र में होने लगा था। भाग वर्षा वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हलों द्वारा उर्वर भूमि की जुताई की जाने लगी। इसके अतिरिक्त गंगा की घाटी में धान की रोपाई से भी उपज में भारी वृद्धि होने लगी। भले ही इसके लि किसानों की कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती थी।
2. कुदाल का उपयोग : यद्यपि लोहे के फाल वाले ह के प्रयोग से फसलों की उपज बढ़ने लगी, तो भी ऐसे हलों क उपयोग उपमहाद्वीप के कुछ ही भाग तक सीमित था। पंजाब त राजस्थान के अर्ध-शुष्क प्रदेशों में लोहे के फाल वाले हल प्रयोग बीसवीं शताब्दी में शुरू हुआ। जो किसान उपमहाद्वीप पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में रहते थे, उन्होंने खेती के लि कुदाल का उपयोग किया। कुदाल ऐसे इलाकों के लिए क अधिक उपयोगी था।
3. कृत्रिम सिंचाई : उपज बढ़ाने का एक और तरीका कृत्रिम सिंचाई का प्रयोग था। सिंचाई के लिए कुओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों के पानी का प्रयोग किया जाने लगा। इनका विकास लोगों ने व्यक्तिगत रूप से भी किया और कृषक समुदाओं ने आपस में मिलकर भी किया। व्यक्तिगत रूप से तालाब, कुछ और नहरें आदि सिंचाई साधन प्रयोग करने वाले लोग प्राय: राज अथवा प्रभावशाली लोग थे।
कृषि के नए तौर-तरीकों का प्रभाव : खेती की इन नय तकनीकों से उपज तो बढ़ी, परंतु इससे इसके कारण खेती से जुडे लोगों में भेद बढ़ने लगे। बौद्ध कथाओं में भूमिहीन खेतिह श्रमिकों, छोटे किसानों और बड़े-बड़े जमींदारों का उल्लेख मिलता है जो किसानों की विभिन्न सामाजिक स्थितियों को दर्शाता है। पाली भाषा में छोटे किसानों और जमींदारों के लिए 'गृहपति' शब्द ग्राम-प्रधान का पद प्रायः वंशानुगत होता था। आरंभिक तमिल संगम साहित्य में भी गाँवों में रहने वाले विभिन्न वर्गों के लोगों का उल्लेख मिलता है; जैसे कि वेल्लालर या बड़े जमींदार, हलवाहा या उल्वर और दास अणिमई। यह भी संभव है कि इन विभिन्नताओं का प्रयोग किया जाता था। बड़े-बड़े जमींदार और ग्राम-प्रधान का आधार भूमि का स्वामित्व, श्रम तथा नयी प्रौद्योगिकी शक्तिशाली माने जाते थे। वे प्राय: किसानों पर नियंत्रण रखते थे। उपयोग रहा हो। ऐसी परिस्थिति में भूमि का स्वामित्व महत्त्वपूर्ण हो गया था।

प्रश्न 11. एक महीने के अखबार एकत्र कीजिए। सरकारी अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यों के बारे में विये गये वक्तव्यों को काटकर एकत्र कीजिए। समीक्षा कीजिए कि इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक संसाधनों के बारे में खबरों में क्या लिखा है। संसाधनों को किस प्रकार से एकत्र किया जाता है और परियोजनाओं का उद्देश्य क्या है। इन वक्तव्यों को कौन जारी करता है और उन्हें क्यों और कैसे प्रसारित किया जाता है ? इस अध्याय में चर्चित अभिलेखों के साक्ष्यों से इनकी तुलना कीजिए। आप इनमें क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं ?
Collect newspaper for one month. Cut and paste all the statements made by government officials about public works. Note what the reports say about the resources required for such projects, how the resources are mobilized and the objective of the project. Who issues these statements, and how why are they communicated ? Compare and contrast these with the evidence from inscriptions discussed in this chapter. What are the similarities and differences that you notice ?

उत्तर : स्वयं अध्ययन कीजिए कुछ उपयोगी संकेत नीचे प्रस्तुत हैं : विद्यार्थियों को एक माह के महत्त्वपूर्ण पुराने समाचार पत्र एकत्र करने चाहिए। ये समाचार पत्र राष्ट्रीय स्तर पर महत्त्वपूर्ण समझे जाने वाले समाचार पत्र होने चाहिए जैसे कि टाइम्स ऑफ इंडिया (नवभारत). दि हिंदुस्तान टाइम्स (हिंदुस्तान), दि हिंदू, राष्ट्रीय उजाला, ट्रिब्यून. पंजाब केसरी, राष्ट्रीय सहारा, स्टेट्समैन आदि। इन समाचार पत्रों को पढ़ते हुए उन महत्त्वपूर्ण कथनों को रेखांकित करो जो रेखांकित कार्यों से संबंधित हों जैसे बहुउद्देश्यीय योजना. रेलवे विस्तार, बिजली उत्पादन, महत्त्वपूर्ण नदियों के प्रदूषण से बचाव, राष्ट्रीय सड़क मार्ग, वायुयान सेवाएँ, राष्ट्रीय रोजगार योजना, वृद्ध पेंशन एवं सामाजिक सुरक्षा एवं इन योजनाओं पर कितनी-कितनी राशि खर्च की गई हो तथा उन परियोजनाओं को किस तरह से तथा उनके लाने क्रियान्वयन के उद्देश्य आदि लिखिए। आप अच्छे टी. वी. चैनलों का सहयोग भी ले सकते हैं। असोक के अभिलेखों में जो कार्य या निर्देश अधिकारियों को दिये गये हैं उनके साथ वर्तमान या समकालीन परियोजनाओं की तुलना की जा सकती है। तुलना में समानताएँ एवं असमानताएँ दोनों ही उल्लेखित की जानी चाहिए।

प्रश्न 12. आज प्रचालित पाँच विभिन्न नोटों और सिक्कों को इकट्ठा कीजिए। इनके दोनों ओर आप जो देखते हैं, उनका वर्णन कीजिए । इन पर बने चित्रों लिपियों, भाषाओं, आकार, माप या अन्य माप समानताओं और असमानताओं के बारे में एक रिपोर्ट तैयार कीजिए। इस अध्याय में दर्शित सिक्कों में प्रयुक्त सामग्रियों तकनीकों, प्रतीकों, उनके महत्त्व और सिक्कों के संभावित कार्य की चर्चा करते हुए इनकी तुलना कीजिए।Collect five different kinds of currency notes and coins in circulation today, For each one of these, describe what you see on the observe and the reserve (the front and the back). Prepare a report on the common features as well as the differences in terms of pictures, scripts and languages, size, shape and any other element that you find significant. Compare these with the coins shown in this chapter, discussing the materials used, the techniques of minting, the visual symbols and their significance and the possible functions that coins may have had.

उत्तर : आप स्वयं करें। उनके लिए कुछ उपयोगी संकेत नीचे प्रस्तुत हैं
(i) सर्वप्रथम विद्यार्थी पाँच विभिन्न नोटों और सिक्कों को इकट्ठा करें जैसे 500 रुपए का नोट, 100 रुपए का नोट, 50 रुपए का नोट, 20 रुपए का नोट, 10 रुपए का नोट, 2 रुपए का नोट, 1 रुपए का नोट। विद्यार्थी सिक्के भी इकट्ठे कर सकते हैं जैसे पाँच रुपए का सिक्का, 2 रुपए का सिक्का, 1 रुपए का सिक्का, 50 पैसे का सिक्का आदि। वर्तमान तथा अध्ययन में वर्णित। चित्रित उल्लेखित मुद्राओं/सिक्कों के साथ वर्तमान नोटों/सिक्कों की तुलना कीजिए
1. लिपियों के नाम यदि संभव हैं तो, 2. भाषा यदि संभव है तो, 3. दो कालांशों के सिक्कों के आकार समानताएँ तथा असमानताएँ।
पुराने सिक्कों के लिए अब चाहे तो किसी अन्य पुस्तक जिनमें चित्र अधिक स्पष्ट हों या किसी अजायबघर में जाकर भी अध्ययन कर सकते हैं। अपनी डायरी में वहाँ कुछ बातें नोट कीजिए।

प्रश्न 1. वैदिक काल में राजाओं द्वारा आयोजित किए जाने वाले दो यज्ञों के नाम लिखो।

उत्तर : (i) राजसूय यज्ञ। (ii) अश्वमेघ यज्ञ।

प्रश्न 2. मौर्य साम्राज्य के पाँच महत्त्वपूर्ण राजनीतिक केंद्रों के नाम लिखिए।

उत्तर : 1. पाटलिपुत्र, 2. तक्षशिला. 3. उज्जैन (या उज्जयिनी), 4. तोशाली. 5. सुवर्णगिरी।

प्रश्न 3. प्रारंभिक भारतीय इतिहास में मौर्य साम्राज्य को एक प्रमुख काल क्यों माना गया था?

उत्तर : प्रारंभिक भारतीय इतिहास में मौर्य साम्राज्य को एक प्रमुख काल माना गया है क्योंकि यह भारतीय इतिहास का पहला विशाल साम्राज्य था जिसमें राजनीतिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में बहुत-सी नई प्रवृत्तियों का विकास हुआ।

प्रश्न 4. सोने के आरंभिक सिक्कों के बारे में संक्षिप्त जानकारी दीजिए।

उत्तर : सोने के सबसे प्रथम सिक्के प्रथम शताब्दी ई० में कुषाण शासकों ने जारी किए थे। इन सिक्कों का आकार और भार तत्कालीन रोमन सम्राटों तथा ईरान के पार्थियन शासकों द्वारा जारी सिक्कों के बिल्कुल समान था। बाद में गुप्त शासकों ने भी सोने के सिक्के चलाए। इनमें प्रयुक्त सोना अति उत्तम था।

प्रश्न 5. मुद्राशास्त्र से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर : मुद्राशास्त्र से अभिप्राय सिक्कों के अध्ययन से है। इसमें सिक्कों पर मिलने वाले चित्रों, लिपि तथा सिक्कों की धातुओं का अध्ययन शामिल है।

प्रश्न 6. 'मनुस्मृति' क्या है? इसमें राजा को क्या सलाह दी गई है?

उत्तर : मनुस्मृति आरंभिक भारत का सबसे प्रसिद्ध विधि ग्रंथ है। यह संस्कृत भाषा में है जिसकी रचना 200 ई० पू० से 200 ई० के बीच हुई थी। इसमें राजा को सलाह दी गई कि भूमि - विवादों से बचने के लिए सीमाओं की गुप्त पहचान बनाकर रखनी चाहिए। इसके लिए सीमाओं पर भूमि में ऐसी वस्तु दबा कर रखनी चाहिए जो समय के साथ नष्ट न हो।

प्रश्न 7. प्रारंभिक भारतीय इतिहास में छठी शताब्दी ई प. को प्रायः एक मुख्य निर्णायक मोड़ क्यों माना जाता है। दो कारण लिखिए।
अथवा
"छठी शताब्दी ई.पू. को भारतीय इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तनकारी बिंदु माना जाता है । " दो तथ्य देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर : 1. इस काल में प्रारंभिक उपनिषद लिखे गये भारतीय दर्शन का स्पष्ट रूप देने का प्रयास हुआ।
2. इस समय देश में कई नये धर्म तथा संप्रदाय उदित हुए जिनमें जैन धर्म तथा बौद्ध धर्म सर्वाधिक प्रमुख एक धार्मिक क्रांति के रूप में सामने आए। बौद्ध धर्म तो कालांतर में भारत के बाहर भी अनेक देशों में फैला। इस समय अनेक महाजनपद (राजतंत्र के राज्य तथा कुछ गणतंत्र) उभरकर आये। भारत कबीलाई राज्यों के स्थान पर साम्राज्य की स्थापना की ओर बढ़ने लगा। मगध एक विशाल तथा शक्तिशाली राज्य उभर कर आया।

प्रश्न 8. छठी शताब्दी ई० पू० से कृषि उत्पादन बढ़ाने लिए प्रयोग किए गए किन्हीं दो तरीकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर : 
(i) कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर क्षेत्र में हल का प्रयोग किया गया।
(ii) भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में उर्वर भूमि की जुताई लोहे के फाल वाले हलों से की जाने लगी।
(iii) उत्पादन बढ़ाने का एक अन्य तरीका था-सिंचाई जो कुओं, तालाबों तथा कहीं-कहीं नहरों द्वारा की जाती थी।

प्रश्न 9. अभिलेख साक्ष्यों की किन्हीं दो सीमाओं का उल्लेख कीजिए। 

उत्तर : (i) कई बार शिलालेखों के अक्षरों को हल्के ढंग से उत्कीर्ण किया जाता है, जिन्हें पढ़ पाना काफी कठिन होता है।
(ii) अभिलेख नष्ट भी हो सकते हैं, जिससे अक्षर लुप्त हो जाते हैं।

प्रश्न 10. बाणभट्ट तथा हर्षचरित की संक्षिप्त जानकारी दीजिए।

उत्तर : बाणभट्ट कन्नौज के शासक हर्षवर्धन का राजकवि था। हर्षचरित नामक ग्रंथ उसी ने लिखा था। संस्कृत भाषा का यह ग्रंथ हर्षवर्धन की जीवनी है।

प्रश्न 11. खरोष्ठी लिपि को कैसे पढ़ा गया? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : (i) पश्चिमोत्तर के अभिलेख खरोष्ठी लिपि में लिखे गए हैं।
(ii) इस इलाके में हिंद-यूनानी राजाओं द्वारा (लगभग द्वितीय-प्रथम शताब्दी ई.पू.) बनवाए गए सिक्कों से जानकारी प्राप्त करने में सरलता हुई है।
(iii) यूरोपीय विद्वान जो यूनानी भाषा की जानकारी रखते थे, उन्होंने अक्षरों का मिलान किया था।
(iv) यूनानी तथा खरोष्ठी दोनों ही लिपियों में 'अपोलोडोटस' का नाम लिखने में एक ही प्रतीक 'अ' का प्रयोग किया गया था।
(v) जेम्स प्रिंसेप ने खरोष्ठी में लिखे अभिलेखों की भाषा की पहचान प्राकृत के रूप में की थी। इसी कारण लंबे अभिलेखों को पढ़ना आसान हो गया।

प्रश्न 12. हर्ष चरित पर दो वाक्य लिखिए ।

उत्तर : हर्ष चरित संस्कृत में लिखी गई कन्नौज के शासक हर्षवर्द्धन की जीवनी है, इसके लेखक बाणभट्ट (लगभग सातवीं शताब्दी ई.) हर्षवर्द्धन के राज कवि थे।

प्रश्न 13. महाजन पद के किन्हीं छ: राज्यों के नाम लिखिए।

उत्तर : वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, गांधार और अवन्ति। 

प्रश्न 14. मौर्यकाल के किन्हीं तीन प्रमुख शिलालेखों और दो स्तंभ लेखों के पाए जाने वाले स्थानों के नाम लिखिए।

उत्तर : शिलालेख-स्थान : (i) मनशेरा, (ii) शाहबाज गढ़ी, (iii) कंधार, (iv) कलसी, (v) गिरनार, (vi) सोपारा। स्तंभ लेख स्थान : (i) सारनाथ, (ii) कौशाम्बी, (if) टोपरा, (iv) मेरठ, (v) रामपुरवा। 

प्रश्न 15. जनपद से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर : जनपद से अभिप्राय ऐसे भूखंड से है जिस पर कोई जन अर्थात् कबीला अथवा कुल पाँव रखता है अथवा बस जाता है। इस शब्द का प्रयोग प्राकृत तथा संस्कृत दोनों भाषाओं में मिलता है। 

प्रश्न 16. दक्षिण भारत में मौर्य के युग के समकालीन तीन प्रमुख शासक जातियों अथवा राज्यों के नाम बताइए। 

उत्तर : चोल या चोल राज्य दूसरा चेर (वर्तमान केरल) या चेर राज्य और तीसरा पांडेय या पांडेय राज्य।

प्रश्न 17. मौर्य साम्राज्य का उदय कब और किसके द्वारा हुआ ? इसमें एक प्रमुख स्थान किसके द्वारा जोड़ा गया?

उत्तर : मगध के विकास के साथ-साथ मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई. पू.) का शासन पश्चिमोत्तर में अफगानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था। उनके पौत्र असोक ने-जिन्हें आरंभिक भारत का सर्वप्रसिद्ध शासक माना जा सकता है-कलिंग (आधुनिक उड़ीसा) पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 18. गंदतिन्दु जातक में दी गई राजत्व की अवधारणाओं का परीक्षण कीजिए।

उत्तर : (i) गंदतिन्दु जातक में बताया गया है कि एक कुटिल राजा की प्रजा किस प्रकार दुखी रहती है। इनमें वृद्ध स्त्रियाँ, पुरुष, किसान, पशुपालक, ग्रामीण बालक तथा जानवर भी शामिल हैं। जब राजा अपनी पहचान बदल कर जनता के बीच गया तो एक-एक करके सभी लोगों ने अपने दुखों के लिए राजा को भला-बुरा कहा।
(ii) लोगों की शिकायत थी कि रात के समय डकैत उन पर हमला करते हैं तथा दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी। इन हालातों से बचने के लिए लोग अपने-अपने गाँव छोड़कर जंगलों में बस गए। इससे पता चलता है कि राजा तथा प्रजा के बीच संबंध तनावपूर्ण रहते थे।

प्रश्न 19. सेल्यूकस के साथ चंद्रगुप्त मौर्य के संघर्ष के क्या दो परिणाम हुए? 

उत्तर : सेल्यूकस का चंद्रगुप्त के साथ संघर्ष 305 ई. पू. में हुआ जब उसने भारत पर आक्रमण किया था। इस संघर्ष के दो प्रमुख परिणाम थे: (i) सेल्यूकस की हार जिसके परिणामस्वरूप उसे चंद्रगुप्त मौर्य को वर्तमान हेरात. काबुल, कंधार और बिलोचिस्तान के चार प्रांत सौंपने पड़े। (ii) चंद्रगुप्त मौर्य ने उसके बदले में सेल्यूकस को 500 हार्थी भेंट किये।

प्रश्न 20. चंद्रगुप्त मौर्य की चार सफल विजय कौन-कौन सी थीं?

उत्तर : 1. पंजाब विजय ( Victory of the Punjab): चंद्रगुप्त मौर्य ने सिकंदर की मृत्यु के पश्चात् पंजाब को जीत लिया।
2. मगध की विजय (Pictory of Magadh): चंद्रगुप्त मौर्य ने कौटिल्य ( चाणक्य) की सहायता से मगध के अंतिम राजा घनानंद की हत्या करके मगध को जीत लिया।
3. बंगाल विजय (Victory of Bengal ): चंद्रगुप्त मौर्य ने पूर्वी भारत में बंगाल को जीत कर अपने अधिकार में कर लिया।
4. दक्षिणी भारत पर विजय (Victory on South): जैन साहित्य के अनुसार आधुनिक कर्नाटक तक उसने अपनी विजय-पताका फहराई थी।

प्रश्न 21. असोक के अभिलेख किन-किन भाषाओं व लिपियों में लिखे जाते थे? उनके विषय क्या थे ? .

 उत्तर : (i) असोक के अभिलेख जनता की पालि और प्राकृत भाषाओं में लिखे हुए होते थे। इनमें ब्रह्मी-खरोष्ठी लिपियों का प्रयोग हुआ था। इन अभिलेखों में असोक का जीवन-वृत्त, उसकी आंतरिक तथा बाहरी नीति एवं उसके राज्य के विस्तार संबंधी जानकारी हैं।
(ii) इन अभिलेखों में सम्राट असोक के आदेश अंकित होते थे।

प्रश्न 22. कलिंग युद्ध का क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर : असोक ने कलिंग (आधुनिक उड़ीसा) के राजा के साथ एक युद्ध किया। ई. पू. 261 में लडे गये कलिंग युद्ध के दूरगामी प्रभाव निम्नलिखित थे :
1. इस युद्ध में असोक विजयी रहा लेकिन उसने अपार जन हानि देखी। सदैव के लिए असोक ने युद्ध लड़ना छोड़ दिया।
2. उसने भेरी घोष के स्थान पर धम्म घोष' की नीति अपनाई।
3. कलिंग का मगध राज्य में विलय हो गया। 

प्रश्न 23, प्रभावती गुप्त कौन थी? उसके संबंध में कौन-सा एक विरला उदाहरण मिलता है?

उत्तर : प्रभावती गुप्त आरंभिक भारत के एक प्रसिद्ध शासक चंद्रगुप्त द्वितीय (375-415 ई०) की पुत्री थी। उसका विवाह दक्कन पठार के वाकाटक परिवार में हुआ था। उसने भूमि-दान दिया था जो किसी महिला द्वारा दान का विरला उदाहरण है।

प्रश्न 24. जेम्स प्रिंसेप के योगदान को भारतीय अभिलेख-विज्ञान में एक ऐतिहासिक प्रगति क्यों माना जाता है?

उत्तर : जेम्स प्रिंसेप के योगदान को भारतीय अभिलेख विज्ञान के इतिहास में महत्त्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि उसने सबसे पहले ब्राह्मी लिपि को पढ़ने तथा समझने में सहायता की।

प्रश्न 25. संगम ग्रंथ क्या हैं ?

उत्तर : संगम ग्रंथ तमिल भाषा के ग्रंथ हैं। ये एक प्रकार की कविताएँ हैं जिनसे हमें पता चलता है कि तमिलकम क्षेत्र में सरदारों ने अपने स्रोतों का संकलन और वितरण किस प्रकार किया।

प्रश्न 26. मौर्य साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर : (i) मौर्य समाज की साम्राज्य में सर्वोच्च स्थिति थी। सरकार के सभी अंग जैसे विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और सेना व वित्त पर उसी का नियंत्रण था। उसके काल में अधिकारीगण आधुनिक उदार, लोकतांत्रिक सरकार के आधुनिक मंत्रियों की तरह शक्ति संपन्न नहीं थे और उनका अस्तित्व पूर्णतया सम्राट की मर्जी पर निर्भर था।
(ii) प्रत्येक शासक का स्वभाव अथवा व्यवहार भिन्न-भिन्न होता था। चंद्रगुप्त मौर्य नि:संदेह एक अधिक कठोर और अनुशासनप्रिय सम्राट था तो उसकी तुलना में अशोक अधिक उदार, शांत स्वभाव का सम्राट था।

प्रश्न 27. समाहर्ता' क्या है?

उत्तर : मौर्यों ने अपनी आय निश्चित करने के लिये करों के निर्धारण वसूली और संग्रह पर बहुत जोर दिया। कर निर्धारण करने वाले अधिकारियों को 'समाहर्ता' के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 28. 'सन्निधाता' शब्द का आशय स्पष्ट करें। 

उत्तर : मौर्यों के समय में कर निर्धारण करने वाले अधिकारी को समाहर्ता कहा जाता था, जबकि कर वसूली और संग्रह करने वाले अधिकारी को सन्निधाता कहा जाता था। 

प्रश्न 29. मौर्य साम्राज्य के चार प्रांतों और उनकी राजधानियों के नाम लिखिए। 

उत्तर : (i) उत्तरापथ की राजधानी तक्षशिला। (ii) प्राच्य की राजधानी पाटलिपुत्र। (iii) दक्षिणापथ की राजधानी सुवर्णगिरी। (iv) अवंति की राजधानी उज्जियनी या उज्जैन नगरी। 

प्रश्न 30, मिनेंद्र की दो उपलब्धियाँ बताइए। 

उत्तर : (i) मिनेंद्र ने काठियावाड़, भरहुत (भडौच) और गंगा-यमुना के मध्यवर्ती क्षेत्र को जीतकर एक विशाल साम्राज्य स्थापित कर लिया। (ii) वह बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार तन-मन-धन से किया। उसके अथक प्रयासों को देखकर लोग उसे देवता की भाँति पूजने लगे।

प्रश्न 31. मगध की प्रारंभिक राजधानी कौन-सी थी ? इसकी एक विशेषता बताओ। चौथी शताब्दी ई० पू० में किस नगर को मगध की राजधानी बनाया गया ? 

उत्तर : मगध की प्रारंभिक राजधानी राजगाह (राजगीर) थी। यह पहाड़ियों के बीच बसा एक किलेबंद शहर था। चौथी शताब्दी ई० पू० में पाटलिपुत्र को मगध की राजधानी बनाया गया जिसे अब पटना कहा जाता है।

प्रश्न 32, राजा या प्रभावशाली लोग भूमिदान क्यों देते थे ? इस संबंध में विभिन्न इतिहासकारों के क्या मत हैं ?

उत्तर : (i) कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह नए क्षेत्रों में कृषि के विस्तार की एक नीति थी।
(ii) कुछ अन्य इतिहासकारों का मत है कि जब किसी राजा का अपने सामंतों पर नियंत्रण ढीला पड़ जाता था तो वह भूमिदान देकर अपने लिए नए समर्थक जुटाता था।
(iii) ऐसा भी माना जाता है कि कुछ राजा भूमिदान देकर अपनी शान और शक्ति का आडंबर रचते थे। 

प्रश्न 33. चंद्रगुप्त विक्रमादित्य कौन था? उसकी मुख्य उपलब्धिय पर प्रकाश डालिए।

अथवा
"चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन काल में गुप्त साम्राज्य अपने उत्कर्ष पर पहुँच गया।" कैसे?

उत्तर : चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (चंद्रगुप्त द्वितीय), समुद्रगुप्त का पुत्र था। उसने 380 ई. से 410 ई. तक शासन किया।सबसे पहले उसने बंगाल पर अपनी विजय पताका फहराई। इसके पश्चात् वल्कीक जाति और अवंति गणराज्य पर विजय प्राप्त की। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण सफलताएँ थीं-मालवा, काठियावाड़ और गुजरात। शकों को हराकर उसने विक्रमादित्य की पदवी धारण की। संस्कृत का महान विद्वान कालिदास उसी के दरबार में रहता था। उसके शासन काल में सुव्यवस्था थी। प्रजा सुखी और समृद्ध थी।

प्रश्न 34. अभिलेख (Inscriptions) का क्या अर्थ है?

उत्तर : अभिलेख उन लेखों को कहा जाता है, जो स्तंभों, चट्टानों, गुफाओं, ताम्रपत्रों और पत्थरों की चौड़ी पट्टियों पर खुदे तत्कालीन शासकों के शासन का सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक व धार्मिक चित्र खींचते हैं।

प्रश्न 35. असोक द्वारा धारण की गई दो उपाधियों के नाम तथा उनके अर्थ बताओ।

उत्तर : अशोक ने 'देवानांप्रिय' तथा 'पियदस्सी' की उपाधियाँ धारण कीं। 'देवानांप्रिय' का अर्थ है-देवताओं का प्रिय तथा 'पिचदस्सी' का अर्थ है-देखने में सुंदर।

प्रश्न 36. इलाहाबाद स्तंभ के ऐतिहासिक महत्त्व का मूल्यांकन कीजिए ।

उत्तर : इलाहाबाद का स्तंभ (Allahabad's inscription) : इलाहाबाद के स्तंभ लेख से गुप्त काल के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। इसमें समुदाय की विजयें और चरित्र अंकित है। हरिसेन नामक कवि ने संस्कृत में इसे लिखा। उस काल की राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक अवस्था, भाषा व साहित्य की उन्नति एवं उसकी नौ विजयों का वर्णन है।

प्रश्न 37. जूनागढ़ शिलालेख के महत्त्व का उल्लेख कीजिए। 

उत्तर : जूनागढ़ का शिलालेख, गुजरात में जूनागढ़ के समीप मिला था। उस समय की प्रचलित लिपि ब्राह्मी थी। इसी लिपि में वह शिलालेख लिखा हुआ था। इस शिलालेख में असोक के धर्म, नैतिक नियमों एवं शासन संबंधी नियमों का विवरण मिला है। लोगों की जानकारी के लिये ही इस शिलालेख को जनसाधारण की भाषा पालि में खुदवाया था।

प्रश्न 38 ऐहोल अभिलेख का ऐतिहासिक महत्त्व क्या है?

उत्तर : इस अभिलेख में चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि रति कीर्ति ने संस्कृत में उसके पराक्रम का विवरण लिखा है जिसके अनुसार गुजरात के लट, मैसूर के गंगा आदि राजाओं को हराया गया था। दक्षिण के चेर, चोल और पांड्य शासकों को भी हराया गया था। सन् 620 ई. में उसने हर्ष को नर्मदा नदी के तट पर हराया। जब पुलकेशिन द्वितीय ने पल्लव शासन नरसिंह वर्मन से टक्कर ली, तो फिर उसके पश्चात् सन् 642 ई. में लड़ता हुआ युद्ध क्षेत्र में उसके हाथों मारा गया।

प्रश्न 39. प्रशस्तियों से गुप्त शासकों की तथ्यात्मक जानकारी किस प्रकार मिलती है? 

 उत्तर : प्रशस्तियों की रचना शासकों की प्रशंसा करने के लिए लिखे गए लेख हैं। इनसे हमें राजाओं के शासन के बारे में जानने में बहुत महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है।
उदाहरण : प्रयाग प्रशस्ति से हमें गुप्त राजा समुद्रगुप्त के बारे में बहुत कुछ जानने को मिलता है।

प्रश्न 40. सुदर्शन झील का निर्माण कब और किसने करवाया ? इसकी मरम्मत किस-किस शासक ने करवाई ? 

उत्तर : एक अभिलेख के अनुसार सुदर्शन झील का निर्माण मौर्यकाल में एक स्थानीय राज्यपाल ने करवाया। इसकी मरम्मत शक शासक रुद्रदमन तथा गुप्त शासक ने करवाई थी। 

प्रश्न 41. 'शतक' (Shatak) पद से आप क्या समझते है?

उत्तर : 'शतक' एक विशेष प्रकार का वस्त्र होता था। इसे मथुरा में बनाया जाता था। विदेशों में इस वस्त्र की अत्यधिक माँग थी। इसके निर्यात से भारत को बहुत सी, विदेशी मुद्रा प्राप्त होती थी।

प्रश्न 42, हरिषेण कौन था?

उत्तर : हरिषेण गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त का राजकवि था। उसने समुद्रगुप्त की प्रशंसा में प्रयाग प्रशस्ति लिखी थी जो इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख के नाम से विख्यात है। यह प्रशस्ति संस्कृत में है। प्रश्न 43. मौर्योत्तर युग में कौन-कौन से प्रमुख शिल्प थे? उत्तर : इस युग में वस्त्र बनाने, रेशम बुनने, अस्त्रों एवं विलास सामग्री का निर्माण, सुनार, रंगरेजी (कपड़ा रंगना), धातु - शिल्पियों, दंत शिल्पियों, जौहरियों, मूर्तिकारों, मछुओं, लोहारों, गंधियों (इत्र बनाने व बेचने वालों) के कार्य प्रमुख थे।

प्रश्न 44. जेम्स प्रिंसेप कौन था? भारतीय पुरालेख -शास्त्र के विकास में उसके किसी एक योगदान का उल्लेख कीजिए। 

उत्तर : (क) जेम्स प्रिंसेप ईस्ट इंडिया कंपनी का एक अधिकारी था।
(ख) जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला। इन लिपियों का उपयोग सबसे आरंभिक अभिलेखों और सिक्कों में किया गया है।

प्रश्न 45. 'विष्टि' (Vishti) पद का क्या अर्थ है?

उत्तर : विष्टि का अर्थ है बेगार अर्थात् काम के बदले मजदूरी न मिलना। गुप्त काल में भी विष्टि प्रथा थी, दूसरे शब्दों में सरकारी सेना एवं अधिकारियों से विष्टि (अर्थात् बेगार) कराई जाती थी।

प्रश्न 46. मुक्ति' (Bhukti) शब्द का क्या आशय है? 

उत्तर : गुप्त काल में प्रांत को 'भुकि्ति' कहा जाता था। प्रांत भी कई इकाइयों में बंटा हुआ था। भुक्ति का प्रबंध मुख्यत: राजकुमारों अथवा राजवंश के विश्वस्त लोगों को ही सौंपा जाता था। हैं?

प्रश्न 47. 'विषय' (Vishai) शब्द से आप क्या समझते है? 

उत्तर : गुप्त काल में प्रांत या भुक्तियाँ आगे जिलों (जनपद) में विभाजित थीं जिन्हें 'विषय' कहा जाता था और इनके मुख्य अधिकारी को विषयपति कहा जाता था।

प्रश्न 48. 'वीथी' (Vithi) शब्द को परिभाषित कीजिए।

उत्तर : 'वीरथी' तहसील का समानार्थक है। एक 'वीथी' के अंतर्गत कई गाँव होते थे अर्थात् 'वीथी' की निचली इकाई गाँव कहलाती थी।

प्रश्न 1. भारत के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास को समझने के लिए अभिलेख साक्ष्यों की सीमाओं की आलोचनात्मक परख कीजिए। 

उत्तर : (i) कभी-कभी अक्षरों को बहुत हल्के ढंग से उत्कीर्ण किया जाता है जिन्हें पढना कठिन होता है।
(ii) अभिलेख नष्ट भी हो सकते हैं जिससे अक्षर लुप्त हो जाते हैं।
(iii) अभिलेखों के शब्दों के वास्तविक अर्थ के बारे में पूर्ण रूप से ज्ञान हो पाना भी सदैव सरल नहीं होता क्योंकि कुछ अर्थ किसी विशेष स्थान या समय से संबंधित होते हैं।
(iv) अभिलेख हजारों की संख्या में प्राप्त हुए हैं, परंतु सभा के न तो अर्थ निकाले जा सके हैं और न ही उनके अनुवाद किए गए हैं।
(v) अनेक अभिलेख और भी रहे होंगे जिनका अस्तित्व ही मिट गया है। इसलिए जो अभिलेख अभी उपलब्ध हैं, वे सभवत: कुल अभिलेखों का केवल एक अंश है।
(vi) अभिलेख सदा उन्हीं व्यक्तियों के विचार व्यक्त करते हैं जो उन्हें बनवाते थे। इसलिए वास्तविकता जानने के लिए इन अभिलेखों का आलोचनात्मक अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 2. अभिलेख पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए। इसके अर्थ और चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर : अर्थ (Meaning) : अभिलेख उन्हें कहते हैं जो पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदे हुए होते हैं। अभिलेखों में उन लोगों की उपलब्धियाँ, क्रियाकलाप या विचार लिखे जाते हैं, जो उन्हें बनवाते हैं।
चारित्रिक विशेषताएँ (Characteristics Features) (i) राजाओं के क्रियाकलाप तथा महिलाओं और पुरुषों द्वारा धार्मिक संस्थाओं को दिये गये दान का ब्यौरा होता है।
(ii) अभिलेख एक प्रकार से स्थायी प्रमाण होते हैं। कई अभिलेखों में इनके निर्माण की तिथि भी खुदी होती है।
(iii) जिन अभिलेखों पर तिथि नहीं मिलती है. उनका काल निर्धारण आमतौर पर पुरालिपि अथवा लेखन शैली के आधार पर काफी सुरूपष्टता से किया जा सकता है। उदाहरण के लिए लगभग 250 ई. पू. में अक्षर 'अ' इस प्रकार लिखा जाता था और 500 ई. में यह भ इस प्रकार लिखा जाता था। (v) प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत भाषाओं में लिखे जाते थे। प्राकृत उन भाषाओं को कहा जाता था जो जनसामान्य की भाषाएँ होती थीं। 

प्रश्न 3. जेम्स प्रिंसेप के शोधकार्य से आरंभिक भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन को किस प्रकार एक नई दिशा मिली ?

उत्तर : भारतीय अभिलेख विज्ञान में 1830 के दशक में एक उल्लेखनीय प्रगति हुई। इस कार्य में ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी जेम्स प्रिंसेप का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा जिसने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला। इन लिपियों का प्रयोग सबसे आरंभिक अभिलेखों और सिक्कों में किया गया है। जेम्स प्रिसेप को पता चला कि अधिकांश अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी अर्थात् मनोहर मुखाकृति वाले राजा का नाम लिखा है। कुछ अभिलेखों में राजा का नाम असोक भी लिखा था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार असोक सर्वाधिक लोकप्रिय शासकों में से एक था। इस शोधकार्य से आरंभिक भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन को नयी दिशा मिली, क्योंकि भारतीय और यूरोपीय विद्वानों ने उपमहाद्वीप पर शासन करने वाले प्रमुख राजवंशों की वंशावलियों की पुनर्रचना के लिए विभिन्न भाषाओं के लिए अभिलेखों और ग्रंथों का उपयोग किया। परिणामस्वरूप बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों का उपमहाद्वीप के राजनीतिक इतिहास का एक सामान्य विवरण तैयार हो गया।

प्रश्न 4. असोक के शिलालेखों का भारतीय इतिहास में क्या महत्त्व है ?

उत्तर : अशोक के शिलालेखों का भारतीय इतिहास में बड़ा महत्त्व है- 

(i) उसके अधिकतर शिलालेख सीमांत क्षेत्रों में स्थित हैं। इनकी सहायता से हम असोक के राज्य की सीमाएँ आसानी से निर्धारित कर सकते हैं।
(ii) असोक के शिलालेख हमें अशोक के निजी धर्म और उच्च चरित्र के विषय में जानकारी देते हैं।
(iii) इनसे यह पता चलता है कि असोक के मिस्र, सीरिया, बर्मा (म्यनमार) और श्रीलंका के साथ बड़े अच्छे संबंध हैं।
(iv) इनसे यह पता चलता है कि अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए क्या साधन अपनाए।
(v) शिलालेखों में अंकित राज्यादेशों से पता चलता है कि असोक ने प्रजा की भलाई के लिए अनेक कार्य किए थे। (vi) असोक के शिलालेख मौर्यकालीन कला के सुंदर नमूने हैं। इन्हें विशेष विधि द्वारा तराशा गया है।

प्रश्न 5. "मौर्य साम्राज्य के इतिहास की रचना के लिए इतिहासकारों ने विभिन्न प्रकार के स्रोतों का उपयोग किया है।" स्पष्ट कीजिए।

अथवा

"इतिहासकारों ने मौर्य साम्राज्य के इतिहास की रचना के लिए विभिन्न प्रकार के स्रोतों का उपयोग किया है।" ऐसे किन्हीं दो स्रोतों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर : मौर्य साम्राज्य के इतिहास की रचना के लिए इतिहासकारों ने निम्नलिखित स्रोतों का उपयोग किया है:
(i)मौर्य साम्राज्य के इतिहास की रचना में इतिहासकारों द्वारा प्रयुक्त विभिन्न स्रोतों में पुरातात्विक स्रोत प्रधान हैं। इन पुरातात्विक स्रोतों में से इतिहासकारों ने विशेषतया मूर्तिकला पर अत्यधिक बल दिया है।
(ii) मौर्यकाल के इतिहास को जानने के लिए इतिहासकारों को समकालीन रचनाएँ भी मूल्यवान साबित हुई हैं। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था, द्वारा लिखे गए विशेष विवरण (इण्डिका) के कुछ अंश आज भी उपलब्ध हैं।
(iii) एक और विशेष स्रोत है जो इतिहासकारों के लिए हर दृष्टिकोण से उपयोगी है और जिसका प्रयोग प्रायः किया जाता है. वह है-अर्थशास्त्र। इसकी रचना चन्द्रगुप्त के मंत्री कौटिल्य अथवा चाणक्य ने की थी।
(iv) मौर्य शासकों का जिक्र जैन, बौद्ध व पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है। पत्थरों व स्तंभों पर लिखे असोक के अभिलेख इतिहासकारों के लिए प्रायः बहुत मूल्यवान स्रोत हैं।
(v) असोक के शिलालेख या राज्यादेश लिखित इतिहास में अपनी प्रकार के अनोखे लेख हैं। इन शिलालेखों को असोक ने अपनी प्रजा के पथ प्रदर्शन, उन्हें धार्मिक सिद्धांतों से परिचित कराने के लिए चट्टानों, स्तंभों तथा गुफाओं पर खुदवाया। आदेश असोक के विशाल साम्राज्य के लगभग तीन भिन्न-भिन्न स्थानों पर मिले हैं। इससे इतिहासकारों को साम्राज्य के विस्तार और उसकी धार्मिक विचारधारा की जानकारी मिलती है।

प्रश्न 6. "छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. के बीच मगध सबसे शक्तिशाली महाजनपद बन गया।" इस कथन को प्रमाणित कीजिए।

अथवा

उन कारकों को बताएँ जिन्होंने छठी शताब्दी ई. पू. में मगध को एक शक्तिशाली महाजनपद में उभरने में सहायता की। 

उत्तर : छठी से चौथी शताब्दी ई. पू. में मगध (आधुनिक बिहार) सबसे शक्तिशाली महाजनपद बन गया। आधुनिक इतिहासकार इसके कई कारण बताते हैं
1. एक यह कि मगध क्षेत्र में खेती की उपज खास तौर पर अच्छी होती थी।
2. दूसरे यह कि लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड में) भी आसानी से उपलब्ध थीं जिससे उपकरण और हथियार बनाना सरल होता था।
3. जंगली क्षेत्रों में हाथी उपलब्ध थे, जो सेना के एक महत्त्वपूर्ण अंग थे। साथ ही गंगा और इसकी उपनदियों से आवागमन सस्ता व सुलभ होता था।
4. आरंभिक जैन और बौद्ध लेखकों ने मगध की महत्ता का कारण विभिन्न शासकों की नीतियों को बताया है। इन लेखकों के अनुसार बिम्बिसार, अजातशत्रु और महापदम-नन्द जैसे प्रसिद्ध राजा अत्यंत महत्त्वाकांक्षी शासक थे और इनके मंत्री उनकी नीतियाँ लागू करते थे।
5. प्रारंभ में, राजगाह (आधुनिक बिहार के राजगीर का प्राकृत नाम) मगध की राजधानी थी। यह रोचक बात है कि इस शब्द का अर्थ है 'राजाओं का घर।' पहाड़ियों के बीच बसा राजगाह एक किलेबंद शहर था। बाद में चौथी शताब्दी ई. पू. में पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया गया, जिसे अब पटना कहा जाता है जिसकी गंगा के रास्ते आवागमन के मार्ग पर महत्त्वपूर्ण अवस्थिति थी।

प्रश्न 7. उन तरीकों की व्याख्या कीजिए जिनसे प्राचीन काल में राजा उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेते थे।

उत्तर : प्राचीन काल में राजा उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए निम्न विशेष तरीकों को अपनाते थे :
1. सर्वप्रथम वे स्वयं को देवी-देवताओं से जोड़ लेते थे। यह काम सबसे पहले कुषाण वंश के शासकों ने किया।
2. राजा अपनी मूर्तियाँ बनवाते थे।
3. अपने नाम के सिक्के बनवाते थे।
4. गुप्त वंश के शासकों ने उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए इतिहास, साहित्य, अभिलेखों एवं सिक्कों की सहायता ली।
5. कुछ राजाओं ने राजकवियों की मदद से अपनी प्रशंसा में प्रशस्तियाँ भी लिखवाई। हरिषेण द्वारा रचित 'प्रभाग प्रशस्ति' जो सम्राट समुद्रगुप्त के लिए लिखी गई, एक अच्छा उदाहरण है।

प्रश्न 8. सुदर्शन झील के निर्माण और महत्त्व का उल्लेख कीजिए।

उत्तर : सुदर्शन झील एक कृत्रिम जलाशय था। हमें इसका ज्ञान लगभग दूसरी शताब्दी ई. के संस्कृत के एक पाषाण अभिलेख से होता है। इस अभिलेख को शक शासक रुद्रदामन की उपलब्धियों का उल्लेख करने के लिए बनवाया गया था।
इस अभिलेख में कहा गया है कि जलद्वारों और तटबंधों वाली इस झील का निर्माण मौर्य काल में एक स्थानीय राज्यपाल द्वारा किया गया था लेकिन एक भीषण तूफान के कारण इसके तटबंध टूट गये और सारा पानी बह गया। बताया जाता है कि तत्कालीन शासक रूद्रदामन ने इस झील की मरम्मत अपने खर्चे से करवाई थी और इसके लिए अपनी प्रजा से कर मी नहीं लिया था। इसी पाषाण-खंड पर एक और अभिलेख (लगभग पाँचवीं सदी) है, जिसमें कहा गया है कि गुप्तवंश के एक शासक ने एक बार फिर इस झील की मरम्मत करवाई थी।

प्रश्न 9. देश की एकता हेतु असोक ने कौन-से तीन मार्ग अपनाए ?

उत्तर : ( क ) राजनैतिक एकीकरण (Political unity): असोक ने संपूर्ण देश को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया। केवल कलिंग ही एक ऐसा देश था, जो उसके अधीन न था। ई. पू. 261 में उसने कलिंग को भी जीत लिया इसमें कोई संदेह नहीं कि यह उसकी अन्तिम विजय थी, परन्तु उसने राजनैतिक एकीकरण का अपना विचार पूरा किया।
(ख) एक भाषा और एक लिपि (One language and one script) : अशोक ने अपने अभिलेखों में एक भाषा (प्राकृत) और एक ही लिपि (ब्राह्मी लिपि) का प्रयोग किया, परंतु आवश्यकता पड़ने पर उसने प्राकृत के साथ-साथ यूनानी तथा संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि के साथ खरोष्ठी अरेमाइक और यूनानी लिपियों का भी प्रयोग किया।
(ग) धार्मिक सहिष्णुता (Religious tolerance) : असोक ने स्वयं बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था, परन्तु उसने कभी भी दूसरे धर्म वालों पर इसे अपनाने का दबाव नहीं डाला। अपने राज्य में रहने वाले विभिन्न धर्मों के मानने वालों को उसने अपने-अपने तरीकों से पूजा-अर्चना आदि करने की छूट दे दी थी।

प्रश्न 10, कलिंग युद्ध का असोक पर क्या प्रभाव पड़ा?

अथवा
कलिंग युद्ध और उसके प्रभाव पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

उत्तर: कलिंग युद्ध में एक भीषण रक्तपात को देखकर अशोक का दिल दहल गया। उसे युद्ध के नाम से घृणा हो गई और उसने भविष्य में युद्ध न करने की शपथ ली। उसने अपनी जीवनधारा को ही बदल दिया। कलिंग युद्ध के निम्नलिखित प्रभाव पड़े :
1. धर्म विजय (Victory of Religion) : असोक ने अपने विश्व विजय के स्वप्न व प्रण को तोडकर धर्म विजय की ओर कदम बढ़ाये। उसे अब प्रतीत होने लगा था कि विश्व पर सबसे बड़ी विजय मानव-हृदयों पर विजय प्राप्त करना है।
2. बौद्ध धर्म ग्रहण करना (To adopt Buddha Religion) : कलिंग युद्ध ने असोक की आँखें खोल दीं। उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। यह संभव हो सकता है कि यदि कलिंग युद्ध न होता तो वह बौद्ध धर्म ग्रहण न करता ।
3. जीवन शैली में परिवर्तन (Changes in life style): कलिंग युद्ध से पूर्व असोक ने भी अपने पूर्वजों की भाँति युद्ध लड़े, शिकार खेले, माँसाहार किया और विलासिता का जीवन बिताया परंतु इस युद्ध ने उसकी जीवन धारा को ही बदल डाला। वह अहिंसा का पुजारी और दीन-दुखियों का रक्षक बन गया।
4. निर्बल सैनिक संगठन (Weak Military Admini stration) : युद्ध नीति का त्याग करने के साथ ही सेना का मनोबल गिर गया। मौर्य साम्राज्य के पतन के लिये सेना काफी तक उत्तरदायी है।

प्रश्न 11. असोक के धम्म (धर्म) के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर : (i) कलिंग युद्ध में भीषण रक्तपात को देख असोक का हृदय काँप उठा और उसने भविष्य में अहिंसा की नीति अपनाने की ठानी।
(ii) उसने बौद्ध धर्म से दीक्षा ले ली। असोक एक नये मत का संस्थापक बन गया जो अशोक के धर्म के नाम से प्रसिद्ध है। अपने धर्म के द्वारा वह प्राणी का उद्धार करना चाहता था।
(iii) इस धर्म के द्वारा उसने मृत्यु के बाद के जीवन को भी सुधारने का प्रयास किया क्योंकि इसमें शुद्ध आचरण पर बल दिया जाता है।
(iv) असोक सब धर्मों का आदर करता था। उसके अनुसार सब धर्मों का सार ग्रहण करो, किसी धर्म की निंदा मत करो। सब धर्मों का मूल एक ही है। असोक के धर्म (बौद्ध धर्म) का प्रमुख सिद्धांत था-बड़ों का सम्मान करना। उसके अनुसार मनुष्य को पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए।
(v) असोक ने दान करने को भी महत्त्व दिया है। उसका धर्म सामान्य जीवन को प्रेरणा देता है। उसका आडंबर में विश्वास नहीं था क्योंकि आडंबर से शुद्ध एवं सरल जीवन का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। इस धर्म का अन्य सिद्धांत अहिंसा है। असोक के अनुसार जीव जंतुओं पर दया करना हमारा परम कर्त्तव्य है।

प्रश्न 12. मौर्य साम्राज्य के इतिहास की रचना के लिये प्रयुक्त स्रोतों का वर्णन कीजिए। 

उत्तर : (i) इतिहासकारों ने मौर्य साम्राज्य की रचना के लिए अनेक प्रकार के स्रोतों का उपयोग किया। इनके अंतर्गत पुरातात्विक प्रमाण जैसे मूर्तिकला शामिल किए जाते हैं।
(ii) मौर्यकालीन इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए समकालीन रचनाएँ भी काफी सहायक साबित हुई हैं, मेगस्थनीज द्वारा लिखा गया विवरण इस संदर्भ में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है ।
(iii) कौटिल्य या चाणक्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र भी मौर्य साम्राज्य के बारे में सटीक जानकारी का स्रोत है।
(iv) परवर्ती जैन, बौद्ध तथा पौराणिक ग्रंथों तथा संस्कृत वाङ्मय में भी मौर्य शासकों का उल्लेख प्राप्त होता है। 
(v) असोक के पत्थरों तथा स्तंभों पर मिले अभिलेख मौर्य साम्राज्य के सर्वाधिक मूल्यवान स्रोत माने जाते हैं।

प्रश्न 13. मौर्य शासकों द्वारा किये गये आर्थिक प्रयासों का वर्णन करें।

उत्तर : (i) कौटिल्य ने कृषकों, शिल्पियों और व्यापारियों वसूल किये बहुत से करों का उल्लेख किया है ।
 (ii)सम्भवतः कर निर्धारण का कार्य सर्वोच्च अधिकारी द्वारा होता था। सन्निधाता राजकीय कोषागार एवं भण्डार का संरक्षक होता था। 
(iii) वास्तव में कर-निर्धारण का विशाल संगठन पहली बार मौर्य काल में देखने में आया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में करों की सूची इतनी लंबी है कि यदि वास्तव में सभी कर राजा के लिये जाते होंगे, तो प्रजा के पास अपने भरण-पोषण के लिये नाममात्र को ही बचता होगा। 
(iv) ग्रामीण क्षेत्रों में राजकीय भंडार घर होते थे। इससे स्पष्ट होता है कि कर अनाज के रूप में वसूल किया जाता था। अकाल, सुखा या अन्य प्राकृतिक विपदा में इन्हीं अन्न-भंडारों से स्थानीय लोगों को अन्न दिया जाता था।
(v) मयूर, पर्वत और अर्द्धचंद्र के छाप वाली रजत मुद्राएँ मौर्य-साम्राज्य की मान्य मुद्राएँ थीं। ये मुद्राएँ कर वसूली एवं कर्मचारियों के वेतन के भुगतान में सुविधाजनक रही होंगी। बाजार में लेन-देन भी इन्हीं से होता था।

प्रश्न 14. उत्तर मौर्य काल में शिल्पकला, व्यापार और नगरों के विकास के विषय में बताओ। इस विकास के क्या कारण थे?

उत्तर : (i) कला (Art): इस काल में खनन, धातु एवं शिल्प के काम में पर्याप्त उन्नति हुई। प्राप्त अभिलेखों के अनुसार इस काल में बुनकरों, रंगरेजों, सुनारों, हाथी दाँत पर नक्काशी करने वाले कारीगरों, मूर्तिकारों, जौहरियों तथा लुहारों द्वारा विभिन्न वस्तुओं को तैयार किया जाता था।
(ii) व्यापार (Trade): इस काल में भारत और रोम के बीच व्यापार जोरों पर था। इसमें मुख्यतः विलासिता की वस्तुएँ, माणि, रत्न, मोती, मलमल, मसाले आदि भारत से रोम भेजे जाते थे।
(iii) नगर (Cities): व्यापार की वृद्धि के साथ व्यापारिक स्थलों पर नगरों का विकास भी शीघ्रता से होने लगा। तत्कालीन उत्तर भारत के प्रमुख नगरों के नाम हैं-वैशाली, पाटलिपुत्र, वाराणसी, श्रावस्ती, कौशाम्बी, हस्तिनापुर, मथुरा, इंद्रप्रस्थ आदि। दक्षिणी भारत के प्रमुख नगरों में से थे-धान्य, कटक, टागर, अमरावती, कोंडा, नागार्जुन, भड़ौच, सोपारा आदि।
विकास के कारण (Causes of Development) : इस विकास के मुख्य कारण थे विकसित व्यापार उन्नत हस्त-शिल्प कलाएँ शांति और सुव्यवस्था। लोग धनाढ्य थे। लोगों का जीवन स्तर ऊँचा था, उन्हें राज्य का संरक्षण प्राप्त था। अत: इस विकास में कोई बाधा न थी।

 प्रश्न 15. मौर्य साम्राज्य के इतिहास की रचना करने वाले किन्हीं चार स्रोतों को स्पष्ट कीजिए। मौर्य प्रशासन व्यवस्था की परख कीजिए।

उत्तर : मौर्य साम्राज्य के इतिहास की रचना के लिए इतिहासकारों ने निम्नलिखित स्रोतों का उपयोग किया है:

(i) मौर्य साम्राज्य के इतिहास की रचना में इतिहासकारों द्वारा प्रयुक्त विभिन्न स्रोतों में पुरातात्विक स्रोत प्रधान हैं इन पुरातात्विक स्रोतों में से इतिहासकारों ने विशेषतया मूर्तिकला पर अत्यधिक बल दिया है।
(ii) मौर्यकाल के इतिहास को जानने के लिए इतिहासकारों को समकालीन रचनाएँ भी मूल्यवान साबित हुई हैं। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज जो चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था. द्वारा लिखे गए विशेष विवरण (इण्डिका) के कुछ अंश आज भी उपलब्ध हैं।
(iii) एक और विशेष स्रोत है जो इतिहासकारों के लिए हर दृष्टिकोण से उपयोगी है और जिसका प्रयोग प्रायः किया जाता है, वह है-अर्थशास्त्र। इसकी रचना चन्द्रगुप्त के मंत्री कौटिल्य अथवा चाणक्य ने की थी।
(iv) मौर्य शासकों का जिक्र जैन, बौद्ध व पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है। पत्थरों व स्तंभों पर लिखे अशोक के अभिलेख इतिहासकारों के लिए प्रायः बहुत मूल्यवान स्रोत हैं।
(v) अशोक के शिलालेख या राज्यादेश लिखित इतिहास में अपनी प्रकार के अनोखे लेख हैं। इन शिलालेखों को अशोक ने अपनी प्रजा के पथ प्रदर्शन, उन्हें धार्मिक सिद्धांतों से परिचित कराने के लिए चट्टानों, स्तंभों तथा गुफाओं पर खुदवाया। ये आदेश अशोक के विशाल साम्राज्य के लगभग तीन भिन्न-भिन्न स्थानों पर मिले हैं। इससे इतिहासकारों को साम्राज्य के विस्तार और उसकी धार्मिक विचारधारा की जानकारी मिलती है।

मौर्य प्रशासन व्यवस्था :
(1) मौर्य समाज की साम्राज्य में सर्वोच्च स्थिति थी। सरकार के सभी अंग जैसे विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और सेना व वित्त पर उसी का नियंत्रण था। उसके काल में अधिकारीगण आधुनिक उदार, लोकतांत्रिक सरकार के आधुनिक मंत्रियों की -तरह शक्ति संपन्न नहीं थे और उनका अस्तित्व पूर्णतया सम्राट की मर्जी पर निर्भर था।
(ii) प्रत्येक शासक का स्वभाव अथवा व्यवहार भिन्न-भिन्न होता था। चंद्रगुप्त मौर्य नि:संदेह एक अधिक कठोर और अनुशासनप्रिय सम्राट था तो उसकी तुलना में अशोक अधिक उदार, शांत स्वभाव का सम्राट था।

प्रश्न 16. ईसवी पूर्व प्रथम मध्य सहस्राब्दी का काल विश्व इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस कथन का औचित्य निर्धारित कीजिए। 
अथवा
"ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि का काल विश्व इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।" इस कथन की न्यायसंगत पुष्टि कीजिए।

उत्तर : (i) ईसा पूर्व पहली सहस्राब्दी के दौरान म दक्षिण भारत में शवों के अंतिम संस्कार के नए तरीके अस्तित्व में आए। इनमें पत्थरों के बड़े-बड़े ढाँचे शामिल थे जिन्हें महापाषाण कहा जाता था। कई स्थानों पर शवों के साथ लोहे के बने विभिन्न प्रकार के उपकरणों तथा हथियारों को भी दफनाया गया था।
(ii) इस काल को प्रायः आरंभिक राज्यों, नगरों, लोहे के बढ़ते प्रयोग और सिक्कों के विकास के साथ जोड़ा जाता है। 
(iii) ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी में ईरान में जुरथुस्त्र जैस चिंतक, चीन में खुंगत्सी. यूनान में सुकरात, प्लेटों तथा अरस्तु और भारत में महावीर बुग जैसे कई चिंता का उदय हुआ। उन्होने जीवन के रहस्यों को समझने के साथ-साथ मानव और विश्व व्यवस्था के बीच संबंध को समझने का प्रयास भी किया।
(iv) इस काल में सामाजिक एवं आर्थिक जीवन में भी कई परिवर्तन आ रहे थे।

प्रश्न 17. छठी शताब्दी ई.पू. में भूमिदान के प्रचलन से राज्य और किसानों के बीच संबंध की झाँकी किस प्रकार मिलती है ? स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर : छठी शताब्दी ई.पू. में भूमिदान के प्रचलन से राज्य और किसानों के बीच संबंध की झांकी निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत स्पष्ट की जा सकती है :
1. भूमिदान अभिलेख देश अनेक भागों से मिले हैं। क्षेत्रों में दी गई भूमि की माप में अंतर पाया जाता है। कहीं-कहीं छोटे टुकड़े तो कहीं-कहीं बड़े-बड़े क्षेत्र दान में दिए गए हैं।
2. भूमिदान में दान प्राप्त करने वाले लोगों के अधिकारों में भी क्षेत्रीय परिवर्तन पाए जाते हैं। वस्तुतः इतिहासकारों में भूमिदान का प्रभाव एक गर्म विवाद का विषय बना हुआ है। 
3. कुछ इतिहासकारों का मत है कि भूमिदान शासक वंश द्वारा कृषि को नए क्षेत्रों में प्रोत्साहित करने की एक रणनीति थी। 
4. जबकि अन्य इतिहासकारों का मत है कि भूमिदान से दुर्बल होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत मिलता है। इसका तात्पर्य यह था कि राजा का शासन सामंतों पर दुर्बल होने लगा तो उन्होंने भूमिदान के जरिए अपने समर्थन जुटाने शुरू कर दिए।
5. इतिहासकारों का यह भी मत है कि राजा स्वयं को बेहतर स्तर के मानव के रूप में प्रदर्शित करना चाहते थे। हालाँकि उनका नियंत्रण लगातार ढीला होता जा रहा था। इस प्रकार, भूमिदान के प्रचलन से राज्य तथा किसानों के बीच संबंध की झाँकी मिलती है।

प्रश्न 18.खरोष्ठी लिपि को कैसे पढ़ा गया

उत्तर : पश्चिमोत्तर के अभिलेखों में प्रयुक्त खरोष्ठी लिपि का पढ़े जाने की कहानी रोचक है। इस कार्य में यहाँ शासन करने वाल हिंदु-यूनानी राजाओं (लगभग द्वितीय-प्रथम शताब्दी ई०पू०) द्वारा बनवाए गए सिक्कों से जानकारी प्राप्त करने में आसानी हुई। इन सिक्कों में राजाओं के नाम यूनानी और खरोष्ठी में लिखे गए हैं। यूनानी भाषा पढ़ने वाले यूरोपीय विद्वानों ने अक्षरों का मेल कराया उदाहरण के लिए दोनों लिपियों में अपोलोडोट्स का नाम लिखने में एक ही प्रतीक मान लीजिए 'अ' प्रयुक्त किया गया क्योंकि पिलेप ने खरोष्ठी में लिखे अभिलेखों की भाषा की पहचान प्राकृत के रूप में की थी, इसलिए लंबे अभिलेखों को पढ़ना सरल हो गया।

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